Saturday

औरत

         पुरानी इमारतों सी जर्जर होती औरते
  
       ऊपर से लिपि पुती अंदर से खोखली होती औरते
   
   प्रेम की  तलाश में भटक कर बावरी होती औरते

    जीवन सुख को तराजू में तौलकर सौदागर होती औरते
    
      मासूमियत  को  दबा कर आक्रोशित होती औरते
      
          निश्छल प्रेम के दाम पर छली जाती औरते 
          
        यकीनन दिल से  जुड़ कर टूट जाती औरते

        विशाल दुनियां को बेहद छोटी आँखों से देखती औरते

         छोटे से सुख को पा कर मुस्कुरा देती औरते

         बड़े से दुःख को लेकर जीती रहती ये औरते
    
        कमजोर पुरुषो की बदौलत मजबूत होती औरते
     
        औरतों के स्नेह पर अविश्वास जताती औरते
     
         ये औरते हम सभी के आस पास घूमती है ये औरते ।। 
                                      
                              

2 comments:

ब्लॉग बुलेटिन said...

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, "भूली-बिसरी सी गलियाँ - 10 “ , मे आप के ब्लॉग को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

सुशील कुमार जोशी said...

सुन्दर अभिव्यक्ति । ब्लौगर का फौलोवर विजेट भी लगाइये ताकि ब्लौब को फौलो किया जा सके और छपने की खबर मिलती रहे ।